Friday, November 13, 2009

मीडिया रेग्यूलेशन के सवाल

टेलीविजन चैनलों में दिखाए जा रहे बेहूदा कार्यक्रमों की वजह से लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है. इसकी अनदेखी करना अब सरकार के लिए भी आसान नहीं है. इसलिए पिछले दिनों सूचना और प्रसारण मंत्रालय इस मामले में काफ़ी सक्रिय दिखा. मंत्रालय ने मीडिया रेग्लूलेशन के लिए एक थ्री टीयर प्लान पेश किया है. इस प्लान के मुताबिक़ सबसे पहले चैनल में दिखाए जा रहे कार्यक्रम की ज़िम्मेदारी ख़ुद चैनल की होगी. दूसरे स्तर पर इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फ़ाउंडेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन जैसे संगठन चैनलों के कामकाज़ पर नज़र रखेंगे. आख़िरी में अगर ज़रूरी हुआ तो एक ऑटोनॉमस रेग्यूलेटरी बॉडी चैनलों पर नज़र रखेगी. सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने ये सफ़ाई भी दी है कि सरकार न्यूज़ चैनलों के कंटेंट को रेग्यूलेट नहीं करना चाहती.
देश के टेलीविजन चैनल क़ायदे-क़ानून की सारी हदें पार कर चुके हैं. अब तक उन पर लगाम लगाने की कोई कोशिश क़ामयाब नहीं हो पाई है. जब भी रेग्यूलेशन की बात होती है तो चैनल सेल्फ़ रेग्यूलेशन की माला जपने लगते हैं. वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के चौथे खंबे पर ख़तरे की दुहाई देना भी नहीं भूलते. लेकिन अब उनकी पोल खुल चुकी है. दरअसल इन ख़ूबसूरत शब्दों की आड़ में मीडिया घराने अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं. उनकी करतूतों से इतना साफ़ हो चुका है कि वो मुनाफ़ा कमाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं. इस काम में टेलीविजन चैनलों के मैनेजर उर्फ़ संपादक अपनी कुर्सी बचाने के लिए मालिकों के प्रति अपनी वफादारी का कोई भी मौक़ा किसी हालत में नहीं छोड़ना चाहते. ऐसे में चैनल कैसे सेल्फ़ रेल्यूलेशन करेंगे ये लाख टके का सवाल है.
चौतरफ़ा दबाव पड़ने के बाद टेलीविजन चैनलों ने मिलकर पिछले साल न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) बना डाला. समाचार चैनलों के अलावा बाक़ी चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाला इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फ़ाउंडेशन पहले से ही अस्तित्व में है. इस तरह के संगठनों का एकमात्र लक्ष्य मीडिया घरानों के व्यायसायिक हितों को सुरक्षित रखने के अलावा और कुछ नहीं है. आदर्शों की बात उनके लिए महज़ दिखावा है. यहां सरोकारों वाले कार्यक्रम या ख़बरें भी तभी जगह पाती हैं जब उससे कुछ मुनाफ़ा मिलने की उम्मीद हो. मुनाफ़ा कमाना ही इनका पहला और आख़िरी लक्ष्य है.
जब एनबीए का गठन किया गया तो हर चैनल के न्यूज रूम में उसकी गाइड लाइन चिपका दी गई थी. लेकिन कुछ ही वक़्त बाद सबने देख लिया कि उस क़ागज की कोई अहमियत नहीं है. इंडिया टीवी का तमाशा जारी रहा. जुर्माना करने पर उसने एनबीए से ही रिश्ता तोड़ लेने की घोषणा कर ली.
सरकारी पहलकदमी को लेकर जन सरोकारों से जुड़े लोगों में डर रहा है कि रेग्यूलेशन के नाम पर सरकार मीडिया को नियंत्रित न करने लगे. अगर ऐसा हुआ तो ये भारतीय लोकतंत्र में अब तक हासिल थोड़ी-बहुत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी हाथ धोना होगा. इस संदर्भ में ये बात समझना ज़रूरी है कि न तो मुनाफ़ाखोर मीडिया घराने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बचा सकते हैं और न ही सिर्फ़ सरकार अराजक हो चुके चैनलों को सही रास्ते पर ला सकती है. इस संदर्भ में ये बात भी स्पष्ट करनी पड़ेगी कि मीडिया में सबसे पहले सरकार, मीडिया कंपनी या जनता में से किसके हित देखे जाने चाहिए.
सूचना और प्रसारण मंत्रालय की तरफ़ से तीसरे स्तर पर इंडिपेंडेंट रेग्यूलेटर की बात की गई है. लेकिन उसके बारे में कुछ भी साफ़ नहीं बताया गया है. ऐसी बॉडी में जब तक समाज के जागरूक तबकों को शामिल नही किया जाएगा तब तक उसकी कोई अहमियत नहीं होगी. उसमें जन आंदोलनों से जुड़े लोगों, मीडिया विशेषज्ञों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, क़ानूनविदों और लेखकों समेत बाक़ी पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स को भी शामिल किया जाना चाहिए. ऐसी व्यवस्था भी हो कि इस ऑटोनॉमस बॉडी को मीडिया हाउस और सरकार अपने स्वार्थों के लिए प्रभावित न कर पाएं. सबसे बड़ी बात कि ये सिर्फ़ सफेद हाथी बनकर न रह जाए. इसलिए इसे कार्रवाई के लिए क़ानूनी अधिकार देने ज़रूरी होंगे. वरना प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाओं का हश्र किसी से छिपा नहीं है.

आसान नहीं होगा नया न्यूज चैनल खोलना ?
सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने टेलीकॉम रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (ट्राई) से कहा है कि वो नए चैनलों को लाइसेंस देने में सावधानी बरते. पहले वो नए चैनल खोलने वाले के आर्थिक संसाधनों का मूल्यांकन करे. इस बात का पता लगाए कि लाइसेंस लेने वाला कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने में सक्षम है या नहीं. साथ ही मीडिया के क्षेत्र में उसके पूर्व के काम को भी आधार बनाया जाए. इन सब से बढ़कर मंत्रालय न्यूज़ चैनलों की संख्या को सीमित करने के बारे में भी विचार कर रहा है. हाल के दिनों में कई अपराधी और समाज विरोधी क़िस्म के लोगों ने टेलीविजन चैनलों में पैसा लगाना शुरू किया है. इसमें मुनाफ़ा कमाने की इच्छा तो थी ही रुतबा हासिल कर अपने बुरे कामों पर पर्दा डालने का मक़सद भी काम कर रहा था. इस साल वॉइस ऑफ़ इंडिया नाम के न्यूज़ चैनल का पतन मीडिया सर्कल में चर्चा का विषय बना रहा. पत्रकारिता का जो मज़ाक इस चैनल ने बनाया वो किसी से छिपा नहीं है. आख़िरकार चैनल मालिकों की बेईमानी की वजह से सैकड़ों मीडियाकर्मियों को सड़क पर आना पड़ा.
आर्थिक मंदी की वजह से ये साल मीडियाकर्मियों के लिए बहुत भयानक रहा. बड़ी संख्या में उन्हें अपने रोज़गार से हाथ धोना पड़ा. नए चैनलों ने ही नहीं हुई बल्कि पुराने और स्थापित चैनलों ने भी मंदी की मार का बहाना कर मीडिया कर्मियों पर गाज़ गिराई. मोटी-मोटी तनख़्वाह पाने वाले समाज से कटे मीडियाकर्मियों को जब बाहर का रास्ता दिखाया तो वो कोई प्रतिरोध नहीं कर सके. वैसे भी मीडिया घरानों में अब ट्रेड यूनियन नाम की कोई चीज नहीं बची है. इसके लिए सरकार भी अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकती जो आर्थिक उदारीकरण की दौड़ में लगातार श्रम क़ानूनों को ढीला करती जा रही है. सरकार अगर सचमुच मीडियाकर्मियों का ध्यान रखना चाहती है तो उसे श्रम क़ानूनों की गारंटी करने वाले क़दम भी उठाने होंगे.
हर साल ट्राई बड़ी संख्या में कई न्यूज चैनलों को लाइसेंस देता है. इनमें से कई तो कभी अस्तित्व में ही नहीं आते. इसके पीछे चैनल का नाम हासिल करने और उसको बेचने का धंधा भी ज़ोरों पर है. चैनल हासिल करने के लिए चलने वाला रिश्वतखोरी का खेल कैसे रुकेगा इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता. लेकिन अगर नए चैनलों को लाइसेंस देने में पारदर्शिता और क़ानून को ध्यान में रखने की बात की जा रही है तो इसे धरातल पर भी दिखना चाहिए. बेहतर तो तो ये होता कि पूंजीवादी घरानों की दया से चलने वाले न्यूज़ चैनल्स की बजाय सहकारी स्तर पर चलने वाले जनपक्षीय वैकल्पिक न्यूज चैनल भी विकसित होते.

टैम की टीआरपी पर सवाल
टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट (टीआरपी) फिर विवादों के घेरे में है. इस बार टीआरपी मापने वाली संस्था टैम मीडिया रिसर्च लिमिटेड की ईमानदारी पर सीधे सवाल उठे हैं. इस संगठन में क्रॉस होल्डिंग का मामला सामने आया है. यानी टैम जिन संस्थाओं की रेटिंग करता है. उनमें से कुछ के साथ उसके वित्तीय हित भी जुड़े हैं. टेलीकॉम रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (ट्राई) इस सिलसिले में पहले ही अपनी रिपोर्ट सूचना और प्रसारण मंत्रालय को सौंप चुका है. मंत्रालय ने इस बात को गंभीरता से लेते हुए ज़रूरी कार्रवाई करने की बात कही है.
हर हफ़्ते आने वाली टीआरपी पर सभी चैनलों और विज्ञापनदाताओं की नज़रें टिकी रहती हैं. जिस चैनल की टीआरपी जितनी ज़्यादा होती है उस चैनल को उतने ही ज़्यादा विज्ञापन मिलते हैं. यानी ज़्यादा टीआरपी का मतलब ज़्यादा मुनाफ़ा. भारत में टीआरपी मापने का काम मुख्य तौर पर टैम मीडिया रिसर्च करता है. अभी इस कंपनी में एसी नीलसन और आईएमआरबी इंटरनेशनल की पचास-पचास फ़ीसदी की भागीदारी है. इनमें से आईएमआरबी इंटरनेशनल देश की एक प्रमुख विज्ञापन एजेंसी जे वॉल्टर थॉम्पसन (जेडब्ल्यूटी) की मार्केट रिसर्च विंग है. दूसरा ग्रुप एसी नीलसन भी मीडिया रिसर्च से जुड़ी सुविधाएं मुंहैया कराता है. उदाहरण के तौर पर ये संस्था चुनाव परिणामों के वक़्त कई टेलीविजन न्यूज चैनलों को आंकड़े बेचती है. इस बात से ये शंका जताई जा रही है कि टैम के रिश्ते जिन संस्थाओं से हैं वो उनको फ़ायदा पहुंचाने की कोशिश कर सकती है.
भारत में टैम के अलावा ऑडिएंस मेजरमेंट एनालिटिक्स लिमिटेड (एमैप) भी व्यावसायिक तौर पर टेलीविजन चैनलों की रेटिंग बताता है. इसके पास अपेक्षाकृत ज़्यादा आधुनिक तकनीक है और ये हर एक दिन की रेटिंग निकालता है. लेकिन अभी मुख्यतया टैम की रेटिंग पर ही टेलीविजन उद्योग निर्भर है. इस रेटिंग को पाने की होड़ में ही टेलीविजन चैनल लगातार सामाजिक सरोकारों से कटे सनसनीखेज़ कार्यक्रम पेश कर रहे हैं. ख़ास तौर पर समाचार चैनलों का पत्रकारिता के उसूलों को दांव पर लगाकर बेहूदा और मनगढ़ंत ख़बरों का प्रसारण करना इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है.
टैम ने अभी देश के क़रीब सात हज़ार घरों में रेटिंग मापने के लिए पीपल्स मीटर लगा रखे हैं. भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में छह हज़ार मीटरों से लिए गए सैंपल को किसी भी लिहाज से सही नहीं ठहराया जा सकता है. ये मीटर भी एक लाख से ज़्यादा आबादी वाले शहरों में ही लगे हैं. इसके साथ ही टैम ने बिहार, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और उत्तर पूर्व के राज्यों में कोई मीटर नहीं लगा रखे हैं. ए मैप ने भूगोल का थोड़ा ध्यान रखा है और उसने देश के सभी राज्यों में मीटर लगाने की कोशिश की है. लेकिन उसने भी उत्तर पूर्वी राज्यों में सिर्फ़ गुवाहाटी में मीटर लगा रखे हैं. इन तथ्यों की रोशनी में ये कहा जा सकता है कि टेलीविजन कार्यक्रमों की लोकप्रियता मापने वाली टीआरपी की विश्वसनीयता ख़ुद कई तरह से संदेह के घेरे में है.
पिछले साल ट्राई ने ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल (बीएआरसी) को टीआरपी का नियमन करने की इजाज़त दी थी. बीएआरसी को मीडिया उद्योग की तरफ़ से विज्ञापनों के लिए सेल्फ़ रेग्यूलेशन के नाम पर दो हज़ार सात में गठित किया गया था. इसे इंडियन सोसायटी ऑफ़ एडवर्टाइजर्स, इंडियन ब्रॉडकास्ट फ़ाउंडेशन और एडवर्टाइजिंग एजेंसीज एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने मिलकर बनाया है. लेकिन अब तक ये संस्था प्रभावी रोल में नहीं आ पायी है. इसमें सरकार की तरफ़ से दो निदेशकों की नियुक्ति करने की बात थी. लेकिन सेल्फ़ रेग्यूलेशन के नाम पर बीएआरसी ने सरकार के इस क़दम का विरोध किया.
ट्राई के निर्देशों में ये भी साफ़ लिखा था कि प्रमोटर कंपनी और रेटिंग एजेंसी के डायरेक्टरों का किसी ब्रॉडकास्टर, विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजेंसी में हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए. ठीक इसी तरह प्रसारक, विज्ञापनदाता और विज्ञापन एजेंसी की भी कोई हिस्सेदारी रेटिंग एजेंसी में नहीं होनी चाहिए. इन निर्देशों को मान लेने पर विवादों से घिरे क्रॉस होल्डिंग के मामले पर विराम लग सकता था लेकिन बीएआरसी ने इस निर्देशों को मानने में कोई रुचि नहीं दिखाई.
ट्राई की सिफ़ारिशों के मुताबिक़ बीएआरसी ख़ुद टीआरपी नहीं माप सकती. उसे अलग-अलग रेटिंग एजेंसियों से प्रस्ताव मांगने होंगे और प्रसारण मंत्रालय की गाइड लाइंस को ध्यान में रखकर ही किसी एजेंसी को टीआरपी मापने की ज़िम्मेदारी सौंपनी होगी. इसका मक़सद रेटिंग एजेंसियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाना और रेटिंग की ज़्यादा विश्वसनीय सेवाएं पाना बताया गया है. ट्राई ने ये भी कहा है कि रेटिंग करते वक़्त सैंपल साइज बढ़ाया जाए और शहरी इलाक़ों के अलावा ग्रामीण इलाक़ों का भी ध्यान रखा जाए. लेकिन बीएआरसी का कहना है कि टीआरपी मापने में सरकार का कोई रोल नहीं होना चाहिए बल्कि वो ख़ुद ही सारी ज़िम्मेदारी उठाने में पूरी तरह से सक्षम है. इसलिए मामला अब तक लटका पड़ा है.
पत्रकारिता के उसूलों को ध्यान में न्यूज़ चैनलों का टीआरपी के लिए हाय-तौबा मचाना उचित नहीं. शोध के लिहाज़ से ज़रूरी होने पर टीआरपी का ऐलान महीने या छह महीने में एक बार किया जा सकता है. इससे न्यूज़ चैनल की लोकप्रियता का पता लगाने में मदद मिलेगी. हर रोज़ और हर हफ़्ते टीआरपी निकलने पर न्यूज़ चैनलों पर और ज़्यादा दबाव पड़ेगा और वे पत्रकारिता की आड़ में सारे कुकर्म करते रहेंगे. टीआरपी को ज़रूरी बताने वालों को ये नहीं भूलना चाहिए कि न्यूज़ चैनल पत्रकारिता के नाम पर सरकार से कई तरह के फ़ायदे लेते हैं. इसलिए उन्हें सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाने का साधन नहीं बनने दिया जा सकता. न्यूज़ चैनलों में विज्ञापन और ख़बरों के अनुपात को लेकर भी कोई मापदंड ज़रूर तय किए जाने चाहिए. इस बात पर भी नज़र रहनी चाहिए कि किसी फिल्म या किसी समारोह का मीडिया पार्टनर बनने पर समाचार चैनल नैतिकता को ताक पर रखकर फिल्म या समारोह का प्रचार-प्रचार करने में न जुट पाएं.
भारत का विशाल बाज़ार लगातार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया कंपनियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. रुपर्ड मुर्डाक जैसा मीडिया मुगल इस बाज़ार की अहमियत के बारे में कई बार कह चुका है. दो हज़ार सात के आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में टेलीविजन उद्योग को बाइस हज़ार छह सौ करोड़ का वार्षिक रेवेन्यू मिला था. इनमें से क़रीब पैंतीस फ़ीसदी यानी आठ हजार करोड़ टेलीविजन विज्ञापनों से मिला था. ये विज्ञापन अक्सर चैनल के कंटेंट और क़ीमत को भी तय करते हैं. इन सारे तथ्यों की रोशनी में ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि लोकतंत्र का चौथा खंभा सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाने वाला उद्योग बनकर न रह जाए. इसलिए मीडिया के कंटेंट से लेकर उसके संचालन तक सभी पक्षों पर जनता की नज़र होना जरूरी है.

Wednesday, November 11, 2009

पहाड़ में प्रतिरोध का सिनेमा

भारत सिंह चुफाल
प्रतिरोध की थीम पर केंद्रित नैनीताल फिल्मोत्सव सात-आठ नवम्बर को शैले हाल, मल्लीताल में हुआ. नेत्र सिंह रावत और एन.एस.थापा को समर्पित इस उत्सव को जन संस्कृति मंच और युगमंच ने सम्मिलित प्रयासों से किया था. यह दिल्ली जैसे महानगरों में होने वाले भड़कीले फ़िल्मी समारोहों से कई मायनों में हटकर था. दस-पंद्रह कार्यकर्ताओं की टीम के साथ आयोजन का ज़िम्मा संभाले ज़हूर आलम. नई फिल्म शुरू होने से पहले दर्शकों को फिल्म की जानकारी देते और फिल्म शुरू होने के बाद बाहर स्टॉल पर जा बैठते संजय जोशी. फिल्मों के बीच में सहयोग राशि के लिए डिब्बे लेकर घूमते युगमंच के कार्यकर्ता. दीवारों पर लगे दुनिया को बदल डालने की अलख जगाते पोस्टर. हॉल के बाहर लगी संघर्षों की दास्तान कहती पेंटिंग्स. ये कुछ ऐसे दृश्य हैं जो पूरे उत्सव की कहानी को ख़ुद-ब-ख़ुद बयां कर देते हैं.
समारोह की शुरुआत युगमंच के कलाकारों के जनगीतों से हुई. ओपनिंग फिल्म सत्तर के दशक में बनी एम.एस. सथ्यू की "गर्म हवा" थी. फिल्म विभाजन की त्रासदी के पर है. ये विभाजन के बाद आगरा में रह रहे एक मुस्लिम परिवार की कहानी है. इसमें उस वक़्त के माहौल को बख़ूबी उभारा गया है. उसके बाद विभाजन की ही थीम पर राजीव कुमार की एक शॉर्ट फिल्म "आखिरी आसमान" थी. फिल्म पूर्वी बंगाल के चकमा आदिवासियों के दर्द को सामने रखने का काम करती है. अगली फिल्म अजय भारद्वाज की "एक मिनट का मौन" थी. फिल्म जे.एन.यू. के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष चंद्रशेखर की ह्त्या और उसके विरोधस्वरूप उपजे छात्रों के आन्दोलन को कुचलने की कहानी कहती है. पहले दिन की आखिरी फिल्म चार्ली चैपलिन की "मॉर्डन टाइम्स" थी. फिल्म सन् १९३६ में आई थी जब बोलती फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था. चार्ली ने उस दौर में भी मूक फिल्म बनाने को चेतावनी की तरह लिया. यह चार्ली की आखिरी मूक फिल्म थी. फिल्म में चार्ली मंदी के युग में बेरोजगार होते जा रहे मजदूरों की दशा दिखाते हैं. पहले दिन वीरेन डंगवाल के काव्य संग्रह "स्याही ताल" का लोकार्पण भी किया गया.
फिल्मोत्सव के दूसरे दिन का पहला सत्र बच्चों के नाम था. इतवार का दिन होने से स्कूली बच्चे भी मौजूद थे. शुरुआत में राजेश चक्रवर्ती की एनीमेटेड फिल्म- "हिप-हिप हुर्रे" का प्रदर्शन हुआ. इसमें गीतों के जरिये कुछ बाल कहानियों को पिरोया गया था. इसके बोल जावेद अख्तर ने लिखे थे और आवाजें शान, कविता कृष्णमूर्ति आदि की थीं. दूसरी फिल्म रैगडल की बनाई "ओपन अ डोर" थी. इसमें अलग-अलग देशों के बच्चों की ज़िन्दगी के कुछ पलों को फिल्म के रूप में ढाला गया था. सभी कहानियां एक दरवाजे के खुलने और बंद होने के बीच में घटती है. कहानियां एक ओर बच्चों की दुनिया में ले जाती है तो दूसरी तरफ बच्चों के सपनों, कार्यकलापों और खेलों के जरिये उस देश के समाज को दिखाने का काम भी करती हैं. सुबह के सत्र की आखिरी फिल्म माजिद मजीदी की "चिल्ड्रेन ऑव हैवन" थी. फिल्म दो भाई- बहन और उनके एक जोड़ी जूते के आस-पास बुनी है. भाई बहन के जूते गुम कर देता है और उन्हें एक ही जोड़ी जूते से काम चलाना पड़ता है. दूसरे जोड़ी जूते को हासिल करने की कोशिशों की कहानी उनके माँ-बाप, उनके समाज और उसमें मौजूद द्वंद्व को समेटते चली जाती है.
दोपहर के सत्र में नेत्र सिंह रावत की १९७६ में बनाई डाक्यूमेंट्री फिल्म "माघ मेला" थी यह उत्तराखंडी समाज के रीति-रिवाजों, मेले-त्योहारों के दौरान यहाँ की जीवंतता के दर्शन कराती है. अगली फिल्म बीजू टोप्पो की "गाड़ी लोहरदगा मेल" थी. जिसमें रांची से लोहरदगा तक जाने वाली रेल लाइन के नैरो से ब्रॉड गेज़ होने की कहानी है. रेल में फिल्माए झारखंडी लोकगीतों के जरिये उस समाज के रिवाजों और मौजूदा दौर में वहाँ चल रही उथल-पुथल को भी दिखाया गया है. इस सत्र की तीसरी डाक्यूमेंट्री एन.एस.थापा की १९६८ में बनाई "एवरेस्ट" थी. अपने दल के साथ एवरेस्ट अभियान में आई दिक्कतों और उन पर जीत की कहानी कहती रोमांचकारी फिल्म है. दोपहर के सत्र की आखिरी फिल्म विनोद राजा की बनायी "महुआ मेमॉयर्स" थी. फिल्म उड़ीसा, छत्तीसगढ़, झारखण्ड और आंध्र प्रदेश के आदिवासी इलाकों में चल रहे खनन और इसके खिलाफ उठ खड़े हुए आदिवासी समूहों के संघर्षों की दास्तान है.
शाम के सत्र में अशोक भौमिक का "समकालीन भारतीय चित्रकला में जन प्रवृतियां" विषय पर सचित्र व्याख्यान चित्रकला की समझ देने में मददगार रहा. यह व्याख्यान "आम आदमी के साथ होना ही आधुनिक होना है" की थीम पर था. अवनीन्द्र नाथ टेगोर, बी. प्रभा, जैमिनी रॉय, अमृता शेरगिल, नंदलाल बोस, रज़ा, सूजा हों या एम.एफ. हुसैन ये सभी बड़े चित्रकारों के रूप में जाने जाते रहे हैं. लेकिन इनके काम की समीक्षा करने पर पता चलता है कि ये सभी चालू फॉर्मूले को तोड़ पाने में नाकाम रहे हैं. इनके चित्रों में धर्म, नारी शरीर जैसे पुरातन विषय बारम्बार आते रहे हैं. ये जनता के मेहनतकश, दबे-कुचले हिस्से की आवाज़ बन पाने में नाकाम रहे है. बाज़ार प्रायोजित चित्रकला को कुछ चित्रकारों ने चुनौती देने का काम भी किया है. इनमें चित्तप्रसाद, ज़ैनुल आबेदीन और सोमनाथ होड़ के नाम शामिल है. उन्होंने अकाल की विभिषिका और बाल मज़दूरी जैसे विषयों को अपने चित्रों में शामिल किया है.
समारोह की आखिरी फिल्म वित्तोरियो डी सिका की "बाइसिकल थीफ" थी. फिल्म के नायक को इस शर्त पर नौकरी मिलती है कि वो अपनी साइकिल के साथ आएगा. लेकिन काम के पगले ही दिन उसकी साइकिल चोरी हो जाती है. एक ग़रीब आदमी के लिए साइकिल जैसी चीज का गुम हो जाना भी कितना त्रासीदजनक हो सकता है ये इस फिल्म में दिखाया गया है. समारोह के अंत में ज़हूर आलम ने युगमंच के कलाकारों के साथ ये सन्नाटा तोड़ के आ सारे बंधन छोड़ के आ....जैसा दमदार गीत सुनाया.
(लेखक ने कुमाऊं विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए करने के बाद आईआईएमसी, दिल्ली से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है. फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं. सिनेमा के साथ ही बाक़ी कलाओं में भी रुचि रखते हैं. कॉफी हाउस में पहली बार लिखने पर स्वागत)

पहाड़, पतझड़ और मन का भूगोल

लंबे अरसे से सोचता था कि नैनीताल में कोई फिल्म फेस्टिवल किया जाए. दोस्तों के साथ मिलकर योजना बनाने की कोशिश भी की. लेकिन कभी कुछ तय नहीं हो पाया. इस बार पता चला कि अपने ही कुछ पुराने साथी वहां पर फिल्म फेस्टिवल की तैयारी कर रहे हैं तो मैं भी साथ में जुट गया. फेस्टिवल क़रीब आने पर दोस्तों से मिलने की ख़्वाहिश लिए मैं दिल्ली से नैनीताल के लिए निकल पड़ा. हमें उत्तराखंड संपर्क क्रांति से हल्द्वानी तक जाना था. साथ में भारत भी था. शाम चार बजे की ट्रेन थी लेकिन हम तीन बजे ही स्टेशन पहुंच गए. ऐसा बहुत कम हुआ है कि संपर्क क्रांति वक़्त पर चले. यही सोचकर पिछले महीने जब हल्द्वानी जाने के लिए स्टेशन पहुंचा तो ट्रेन प्लेटफॉर्म छोड़ रही थी. तबीयत कुछ ख़राब थी. ऐसे में शारीरिक थकान तो थी ही मानसिक तौर पर भी बड़ी मुश्किल हुई. उस दिन टिकट कैंसल कर दूसरे दिन ट्रेन पकड़ी थी. इस बार पहले से ही तय कर लिया था कि निर्धारित वक़्त से पहले ही प्लेटफ़ार्म पर पहुंच जाएंगे. नतीज़ा ये हुआ कि पूरे एक घंटे प्लेटफ़ार्म पर इंतज़ार करना पड़ा.
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर छह से काठगोदाम के लिए ट्रेन चली तो रिजर्व्ड डिब्बों में भी लोग ठूंस-ठूंस कर भरे हुए थे. कुछ सोते, कुछ जागते और कुछ पढ़ते रात के ग्यारह बजे हल्द्वानी पहुंचे. ट्रेन एक घंटा लेट थी. किसी रिश्तेदार के घर जाने की बजाय पुराने दोस्त और पत्रकार जहांगीर के पास जाना मुझे ज़्यादा ठीक लगा. वहां पहुंचा तो वो अतीत की बातें करता रहा. कुछ दोस्तों के फोन नंबर उसके पास थे. उनसे बात करवाता रहा. इस बीच भरी जवानी में साथ छोड़ चुके दोस्तों को भी हम याद करते रहे. कभी जो गहरे दोस्त थे और अब अजनबी बन चुके हैं ऐसे रिश्तों की बातें भी बीच में आईं. हम सोचते रहे कि छोटे से वक़्त में कितना कुछ बदल गया है.
सुबह जहांगीर अपनी गाड़ी से टैक्सी स्टैंड तक छोड़कर गया. शेयर्ड टैक्सी जैसे ही काठगोदाम से ऊपर की ओर चली अगली सीट पर बैठा मैं बाक़ी सवारियों से बेख़बर पहाड़ों को गौर से देख रहा था. हवा, पानी, पेड़, पत्थर, ज़मीन सब जाने-पहचाने लग रहे थे. मैं पुराने दिनों को पकड़ने की कोशिश कर रहा था. अचानक लगा कि दिल्ली में रहते मैं इस मिट्टी की गंध से कितना दूर हो गया हूं. नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह मुझ जैसे लोगों को स्वर्ग से ठुकराए हुए लोग यूं ही नहीं कहते. ख़ैर, आधे रास्ते में पता चला कि पिछली सीट में विवेक दा भी बैठे हैं. वो कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता हैं. पिछले कई सालों से दिल्ली में थे अब उत्तराखंड में पार्टी का काम देखते हैं. उन्होंने ही पहचानते हुए पीछे से मेरा नाम पुकारा. मिलकर अच्छा लगा. फिर रास्ते में वो उत्तराखंड में प्राकृतिक संसाधनों की लूट की कहानी बताते रहे. ज़ोर देते रहे कि मैं इस बारे में ज़रूर कुछ लिखूं. उन्होंने ये भी बताया कि कैसे पूरे राज्य में माओवाद का हौव्वा खड़ा कर आंदोलनकारियों पर लगाम कसी जा रही है. पिछले साल पीयूसीएल और पीयूडीआर की तरफ़ से उत्तराखंड आयी फैक्ट फाइंडिंग कमेटी में मैं भी शामिल था. इसलिए मुझे उनकी इस बात की गंभीरता पता थी. हम लोग प्रभाष जोशी की मौत और आज की बाज़ारू पत्रकारिता पर भी बात करते रहे.
नैनीताल मुझे हमेशा से लुभाता रहा है. लेकिन इस बार जब वहां पहुंचा तो लगा कि शहर का रंग उड़ा हुआ है. ये बात मैंने विवेक दा से पूछी. उन्होंने याद दिलाया कि पतझड़ का महीना है. लेकिन मैं सोचता रहा कि आसपास सदाबहार जंगल होने के बाद भी शहर में पतझड़ का इतना असर क्यों है. शायद बाहर से लाकर ज़बरदस्ती यहां लगाए गए पेड़ों की वजह से ऐसा था. पूरे माहौल में मुझे एक नकलीपन जैसा लगा. हम तल्लीताल से रिक्शे पर मल्लीताल के लिए निकले. मुझे अतीत में यहां बिताए दिन याद आते रहे. मॉल रोड से गुजरते हुए मैं हर आदमी और दृश्य को पहचानने की कोशिश कर रहा था. लेकिन सैलानी जोड़ों और दुकानों की चमक-दमक के बीच अपना जैसा कुछ भी नहीं लगा.
शैले हॉल में पहले नैनीताल फिल्म फेस्टिवल की गहमा-गहमी थी. शहर में घुसते ही जो वीराना और अजनबीपन लगा था. यहां आकर वो पूरी तरह दूर गया. एक साथ ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मिले. जिनसे मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी ऐसे साथियों से मिलने का सुख बयान नहीं किया जा सकता. तब लगा नहीं कि वक़्त ने हम सबको एक-दूसरे से कितना दूर कर दिया है. स्कूली दिनों का साथी प्रकाश इतने सालों बाद अचानक मिल गया. उसने बताया कि आजकल वो कहीं एसडीएम है.
ज़िंदगी के अलग-अलग इलाक़ों से लोग यहां पहुंचे थे. कोई आंदोलनों में सक्रिय था तो कोई रंगमंच में, कोई साहित्य में तो कोई सिनेमा में. सब से कोई न कोई पुराना रिश्ता. वे पूरी आत्मीयता से अपने-अपने विषय की बात बताते रहे. आंदोलन वाले मुझसे आंदोलनकारी की तरह बोल रहे थे तो रंगमंच वाले रंगकर्मी की तरह. साहित्य वाले और सिनेमा वालों का भी यही अंदाज़ था. मुझे लगा कि हर रास्ते में चलने की कोशिश में मैं उलझकर रह गया. मुझसे अच्छे तो वो साथी है जिन्होंने गंभीरता से कोई काम किया.
वीरेनदा हमेशा की तरह हुलसकर गले मिले. तो त्रिनेत्र जोशी ने भी सदाबहार मुस्कान के साथ स्वागत किया. इलाहाबाद से प्रणय कृष्ण, कानपुर से पंकज चतुर्वेदी और दिल्ली से अजय भारद्वाज चंद्रशेखर पर बनाई फिल्म एक मिनट का मौन के साथ पहुंचे थे. ज़हूर दा में आज भी वही पुरानी सक्रियता दिख रही थी. शेखर पाठक दोनों दिन डटे रहे. उन्होंने बताया कि वो इन दिनों हिमालयी इलाक़ों में औपनिवेशिक घुसपैठ के ऐतिहासिक अध्ययन को पूरा करने में जुटे हैं. इसके लिए उन्होंने फिर से पूरे हिमालयी इलाक़ों की खाक छान मारी है. बटरोही और गिर्दा भी प्यार से मिले. राजा बहुगुणा, गिरिजा पाठक, कैलाश, केके से मिलकर भी अच्छा लगा. त्रिभुवन फर्त्याल और अनिल रजबार भी बीच-बीच में चेहरा दिखाते रहे. गिरिजा पांडे, प्रदीप पांडे और हरीश पंत भी आते-जाते रहे. गढ़वाल से आए मदन मोहन चमोली अपने फकीरी ठाठ में दिखे. और भी ढेर सारे जाने-पहचाने चेहरे मौजूद थे. पिछले अस्कोट-आराकोट अभियान के अमेरिकी साथी डेन डेंटजन और फ्रांस की पेंटर और फिल्ममेकर कैथरीन से भी मिलकर अच्छा लगा. फेस्टिवल की रीढ़ और फिल्म मेकर संजय जोशी हर वक़्त सही स्क्रीनिंग की व्यवस्था करने में जुटे नज़र आए.
दोनों दिन पूरी गहमा-गहमी रही. फेस्टिवल की ज़्यादातर फिल्में पहले से देखी हुई थीं. इसलिए मैं कभी फिल्म देखता रहा तो कभी हॉल के बाहर दोस्तों से बात करता रहा. वहां चार्ली चैप्लिन की मॉडर्न टाइम्स, वित्तोरियो दे सिका की बाइसिकल थीव्स, माजिद मजीदी की चिल्ड्रन ऑफ़ हैवन और एमएस सथ्यू की गर्म हवा जैसी फिल्में दिखाई गईं. इनके अलावा नेत्र सिंह रावत की माघ मेला और एनएस थापा की एवरेस्ट भी दिखाई गई. प्रतिरोध के सिनेमा का ये पहला फेस्टिवल भी इन्हीं को समर्पित था. इनके अलावा और भी कई डॉक्यूमेंटरीज वहां दिखाई गईं. हैरत की बात ये थी कि फेस्टिवल के दौरान वहां लगातार ख़ुफिया विभाग वाले अड्डा ज़माए रहे. पता चला कि पहले दिन दैनिक जागरण ने छापा था कि फेस्टिवल की आड़ में नैनीताल में नक्सली जुटने जा रहे हैं. इसलिए इंटैलीजेंस वालों के वीडियो कैमरों की नज़र हम पर लगातार लगी रही.
फेस्टिवल फिल्मों के अलावा भी बहुत कुछ था. वहां अवस्थी मास्साब के बनाए पोस्टरों के डॉक्यूमेंटेशन को देखना एक अद्बुत अनुभव था. मास्साब अब दुनिया में नहीं है. वो अपने हाथों से जनआंदोलनों के पक्ष में और सामाजिक विरूपताओं पर चोट करने वाले पोस्टर बनाते थे और उन्हें गले में आगे-पीछे लटका कर शहर में घूमते थे. नैनीताल के लोग इस अद्भुत व्यक्तित्व को कभी भुला नहीं पाएंगे. जब नैनीताल में था तो ज़हूर दा के इंतख़ाब में उनसे अक्सर मुलाक़ात होती थी. विनीता यशस्वी ने उनके पोस्टरों को सहेज कर बहुत बड़ा काम किया है. इस मौक़े पर बीरेन डंगवाल के कविता संग्रह स्याही ताल और दिवाकर भट्ट के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आधारशिला के त्रिलोचन विशेषांक का भी विमोचन हुआ.
फेस्टिवल का सबसे यादगार और महत्वपूर्ण अनुभव रहा भारतीय चित्रकला पर अशोक भौमिक का प्रभावशाली व्याख्यान. सालों से सोचता रहा हूं कि जिसकी पेंटिंग्स जितनी महंगी बिकती हैं वो उतना बड़ा कलाकार कैसे मान लिया जाता है. अशोक दा की बातों में मुझे इस सवाल का जवाब मिल गया. उन्होंने रज़ा, सूजा और हुसैन के मुक़ाबले चित्त प्रसाद, जैनुअल आबीदीन और सोमनाथ होड़ की जनपक्षधर कला से रू-ब-रू कराया. थैंक्यू अशोक दा! फिल्म फेस्टिवल के दौरान ही शहर में सरकारी शरदोत्सव भी चल रहा था. वहां दिखाए जा रहे बाज़ारू कार्यक्रमों की वजह से ज़्यादातर साथी नाराज़ दिखे.
नैनीताल में शाम होते-होते पड़ने वाली हाड़ कंपा देने वाली ठंड का भी अपना ही एडवेंचर था. कुंडल ने ठंड भगाने की कुछ व्यवस्था तो की लेकिन सबकी ठंड दूर कर पाना इतना आसान नहीं था. इसलिए शायद बाहर से आए कुछ साथी निराश भी हुए. रात हमने अभिनेता इदरीश मलिक के होटल में बिताई. आजकल वो पारिवारिक वजहों से शहर में ही रहते हैं. फेस्टिवल के दौरान उनसे मुलाक़ात हो चुकी थी. हां, टीवी कलाकार हेमंत पांडे से भी मिला था. मैंने हैलो किया तो भाई की नज़र हवा में टिक गई. मैं समझ नहीं पाया कि मुझे सचमुछ नहीं पहचाना गया या बात कुछ और थी.
इतनी जल्दी शहर छोड़ने की इच्छा बिल्कुल भी नहीं थी लेकिन जल्दी लौटने की मज़बूरी थी. सुबह साढ़े पांच बजे जागकर हमने होटल छोड़ दिया. सुबह मैं और भारत वॉक करते हुए मल्लीताल से तल्लीताल पहुंचे. नैना देवी के मंदिर में घंटियां बज रही थीं, मैंने घंटियों की आवाज़ की तरफ़ ध्यान दिलाया तो उसने जोड़ा कि इससे पहले आरती और अजान भी सुनाई दे रहे थे. न जाने क्यों नास्तिक होने के बाद भी मुझे आरती और अजान में एक अद्भुत क़िस्म के संगीत का अहसास होता है. वो मेरे लिए म्यूजिक विद्आउट लिरिक जैसा कुछ है. पौ फट चुकी थी. धीरे-धीरे अंधेरा छंट रहा था. तल्लीताल कोर्ट के आसपास के भवन चांदी की तरह चमक रहे थे. ठंडी सड़क की तरफ़ अब भी अंधेरा था. झील में रोशनियों के प्रतिबिम्ब धीरे-धीरे तैरते हुए ख़त्म हो रहे थे. अंग्रेजों के बनाए गोथिक स्टाइल के आर्किटेक्चर में नैनीताल बहुत ख़ूबसूरत लग रहा था.
वो नौ नवंबर का दिन था. यानी उत्तराखंड राज्य स्थापना दिवस. तल्लीताल पहुंचने पर देखा कि उमा भट्ट की अगुवाई में महिला मंच की कार्यकर्ता बसों में भरकर गैरसैंण जा रही थीं. राज्य बनने के नौ साल बीत जाने के बाद भी लोग पहाड़ में राजधानी पाने के लिए लड़ रहे थे. सत्ताधारियों को जनता की ये मांग बेवकूफी लगती है. पहाड़ मुझे वहीं नज़र आया. जहां मैंने सालों पहले छोड़ा था. आंदोलन अब भी जारी हैं और प्रतिरोध की कलाएं उनके साथ खड़ी हैं. नैनीताल के लौटते वक़्त बस की अगली सीट पर बैठे मैंने देखा कि कहीं दूर नेपाल की पहाड़ियों में उग रहे लाल सूरज की किरणें यात्रियों की आंखों को चुंधिया रही थीं. हर मोड पर ये रोशनी और ज़्यादा तेज़ महसूस हो रही थी. ताज्जुब की बात ये कि मैंने आज तक पहाड़ी सफ़र में कभी इस तरह का सूरज नहीं देखा था. बस पटवाडांगर, ज्योलीकोट होते हुए आगे बढ़ रही थी. पतझड़ पीछे छूट चुका था. चारों तरफ़ हरे-भरे पेड़ थे. भावर की ढलान के बाद आगे मैदान शुरू होने थे. फिर एक दूसरे भूगोल में आना था.

Sunday, November 1, 2009

नैनीताल फिल्म फेस्टिवल

सात और आठ नवंबर को पहला नैनीताल फिल्म फेस्टिवल होने जा रहा है. थीम है प्रतिरोध का सिनेमा. जगह है शैले हॉल, नैनीताल क्लब, मल्लीताल. इसमें देश और दुनिया की कई महत्वपूर्ण फिल्में दिखाई जाएंगी. नेत्र सिंह रावत और एनएस थापा को समर्पित इस फेस्टिवल को युगमंच, जन संस्कृति मंच और द ग्रुप मिलकर कर रहे हैं. आसपास रहने वाले साथियों से अपील है कि वो इसमें ज़रूर शिरकत करें. इस दौरान हम भी दोस्तों से साथ दिल्ली के बजाय वहीं पाए जाएंगे.

Friday, October 24, 2008

ARREST CULPRITS OF KANDHMAL AND RESTORE THE RULE OF LAW

The attacks carried out on Christians living in the villages of Kandhamal district, Orissa were planned and executed by the Hindu fundamentalist groups VHP, RSS and Bajrang Dal. With the BJD-BJP combine in power, the state machinery did nothing to stop the criminals from having their way and the violence spread to other parts of the district, which are largely inaccessible. The murder of Laxmananda Saraswati was used as a trigger to instigate large scale violence. A visit by a team from Indian Social Action Forum (INSAF) in the affected areas on October 22-23, revealed the atrocities carried out on the people who have also been living in the same areas with their neighbours from other communities for the last few decades. Though Maoists have claimed responsibility for the killing of Laxmananda Saraswati, the state government so far has yet to make any breakthrough in the case. Nor has it been able to pinpoint who carried out the attacks.

From the night of August 23, mob shouting slogans for Bajrang Dal and proclaiming a Hindu Rashtra went around the villages carrying arms before attacking houses belonging to Christians. In most of the cases, outsiders guided by a section of the villagers led the attacks. Though, the district administration claims to have arrested around 650 people involved in the riot, some of the master-minds are still at large.

The attackers didn't spare women and handicapped (one of whom was burnt to death in Gadaragam). Houses were ransacked and set on fire, belongings stolen. Remains of churches at Rupagam bore grim evidence of the hatred with which the attackers carried out their plans. A woman Salima Pradhan of Gadaragam couldn't flee from the village and is living in the ruins of the houses where her relatives once lived. The woman has received no assistance from the administration and is begging for food.

Another case in point is Beheragam where as many as 40 houses were burnt. The residents managed to escape to the adjoining forest areas and survived. Hardly any of them have been able to return to their homes. Though, the administration has closed down one camp at Bariguda (where the refugees have returned home) in the rest of the camps like the ones in G. Udaygiri it will still take some time for the villagers to feel secure and return home. Those staying in the camps are afraid of another round of violence and don't want to return home. Even the presence of CRPF has done little to boost their confidence. Some of the camp dwellers told the fqact-finding team that only those who converted to Hinduism are being allowed in. They told the fact-finding team that their relatives were forced to tonsure their heads and go through a purification ritual before they were allowed to return. Posters claiming that the a Hindu country is for Hindus still remain. In a burnt down house at Gadaragam, one such poster still remains.

There are some more villagers who have fled to Bhubanaeswar and living in camps. None of them are willing to go back to their homes right now.

The refugees point towards a school Gurukul Sanskrit Mahavidyalaya started by Laxmananda Saraswati at Chakapada from where the anti-Christian feelings are being encouraged. They believe the villages in Kandhamal won't be any safer till the school remain.

At the camps, the people are surviving on the bare minimum. For a family of 10 only two blankets have been provided. There are no less than 3000 people staying in filthy conditions. Among them are the elderly, sick and pregnant women. As many as 40 schools are closed down and the students about to appear Board exams face an uncertain future.

The team urges the Government to immediately:

Provide adequate facilities in the relief camps

Institute a Judicial inquiry into the event

Provide adequate compensation to all victims

Arrests all culprits and restore rule of law

Provide proper rehabilitation of all displaced.


Composition of the team:

1. Chittaranjan Singh, writer/Human rights activist, National Organising Secretary -PUCL, Uttar Pradesh

2. Prashant Nanda, Special Correspondent, IANS, Delhi

3. Arnab Ganguly, Special Correspondent, Times of India, Kolkata

4. Dr. Ms. Shiamala Baby, gender activist - Director, Forward, Tamil Nadu

5. Dr. Ms. Saroop Dhruv, poetess/writer/activist, Ahmedabad

6. Ms. Bala Chauhan, Chief of Bureau (investigation), Deccan Chronicle, Bangalore.

7. Bhupen Singh, writer & news producer, ZEE NEWS, Delhi

8. Dhirendra Panda, activist, Bhubaneswar.

Wednesday, July 2, 2008

एक दोपहर कुरोसावा के साथ

पढ़ाई के दिनों में हम लोग मनोहर श्याम जोशी से स्क्रिप्ट राइटिंग के गुर सीख रहे थे. क़रीब एक हफ्ता हमने उनके साथ बिताया. फार्म्यूला फिल्मों का विरोध करने पर उन्होंने कहा था कि फॉर्म्यूला तोड़ने के लिए भी फॉर्म्यूले को जानना ज़रूरी है. उन्होंने फिर आगे जोड़ा कि कमोबेस जितनी भी कहानियां हमारे पास मौजूद हैं. वो सदियों से हमारे बीच हैं. स्त्री-पुरुष प्रेम, विश्वासघात और युद्ध पर आधारित कहानियों को उदाहरण के बतौर लिया जा सकता है. दो लाइन की कहानी नहीं, उसे कैसे कहा गया है, ये बात महत्वपूर्ण है. इसी तरह कहानी के साथ किया गया ट्रीटमेंट किसी फिल्म को महान या तुच्छ बना सकता है.
अकिरा कुरोसावा की फिल्म RAN देखी तो मुझे मनोहर श्याम जोशी की बात बार-बार याद आती रही. शुरुआत में फिल्म की कहानी सपाट सी लगती रही. जैसे बार-बार सुने-पढ़े शेक्सपीयर के किंग लीयर को जबरदस्ती सुनना-पढ़ना पड़ रहा हो. लेकिन फिल्म आगे बढ़ी तो स्क्रीन से नज़रें नहीं हटा पाया. लगा कि फिल्म सिर्फ बाप को धोखा देने वाली संतान की नहीं बल्कि झूठ,फरेब और युद्ध की भयावहता से रू-ब-रू कराने वाली बेहतरीन कलाकृति है. अद्भुत. जिसमें संदेश भी था और कला भी. कई बार बहुत देर तक बिना किसी शाब्दिक संवाद के फिल्म आगे बढ़ रही थी. मैं तारकोवस्की के सन्नाटे से इसकी तुलना करने लगा. दोनों में ज़मीन आसमान का फ़र्क नज़र आया. तारकोवस्की का सन्नाटा जहां काव्यात्मक लगता है वहीं RAN में शब्दों की ग़ैर मौजूदगी ज़्यादा नाटकीय है. दुख, पीड़ा को व्यक्त करने के नए रास्ते ढूंढ़ती हुई. कुरोसावा ने फिल्म में नई बात और जोड़ी है वो है बुद्ध और शांति की वक़ालत. लेकिन ये कही भी नारे की शक्ल में नहीं है. फिल्म अपने आप इसको कहती जाती है.
फ़िल्म अच्छी लगी.
बाद में पता चला कि १९८५ में बनी इस फिल्म को ऑस्कर भी मिल चुका है और ये जापान की सबसे महंगी फिल्मों में से एक है.

Wednesday, June 25, 2008

अश्लीलता के महल और उनके अपराधी

जिस शहर में लाखों लोग बिना छत के ज़िंदगी बिता देते हों और जिस देश की अस्सी प्रतिशत जनता को न्यूनतम ज़रूरतों से युक्त घर आजीवन न मिलता हो, उस देश के उस शहर में कोई आदमी चार हज़ार करोड़ का सत्ताईस मंजिला मकान छै लोगों और उनके छै सौ नौकर-चाकरों के रहने के लिए बना रहा हो, जिसमें छै मंजिलें सिर्फ गाड़ियां पार्क करने के लिए होंगी, तो इस काम की अश्लीलता, अमानवीयता और अपराधिकता का कोई सानी हो सकता है ? कोई ग़रीब और सभ्य समाज इस तरह की बेहूदगी कैसे सह सकता है ? मुंकेश अंबानी द्वारा मुंबई में बनाया जा रहा बहुमंजिला मकान इस बात का भी प्रतीक है कि एक समाज के रूप में पिछले साठ वर्षों में हम कहां से कहां तक पहुंचे हैं.

समयांतर, जून अंक

Sunday, February 17, 2008

मैं मुसलमान होता तो इस देश में कैसे जीता?

आफताब आलम अंसारी को गोरखपुर धमाकों के आरोप में जिस तरह फंसाने की कोशिश की गई उसके ख़िलाफ़ कई लोगों ने अपनी आवाज़ बुलंद की है. अल्पसंख्यकों के साथ पुलिसिया व्यवहार पर नदीम ने कुछ अहम सवाल उठाए हैं तो आशीष ने देश के माहौल पर एक भावुक-सी टिप्पणी की है.

संजय बेंगाणी :
मजे की बात है दोषियों को बचाया जाता है और बेगुनाहों को सजा दे दी जाती है. बहुत से बेगुनाह जो मुसलमान नहीं होंगे, पकड़ा जाता रहा है. धर्म के आधार पर न पकड़ा जाना चाहिए, न छोड़ा जाना चाहिए.
नदीम:
इस विषय पर साथियों की राय जानकार अच्छा लगा. चलो कोई तो है जो इस तरह सोचता है. वैसे एक मुसलमान होकर किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है क मुसलमान के आलावा कौन बेहतर जान सकता है.में पूर्वी दिल्ली के लक्ष्मी नगर में रहता हूँ पिछली घटनाओ और आतंकियों की पकड़ के बाद से ये इलाका +काफी बदनाम या कहें की मशहूर हो चूका है. आप यकीन मानेंगे की में पिछले ४ सालों से लगातार अपना वोटर आई कार्ड साथ लेकर चलता हूँ.कारन ये की कोई भी समस्या या पूछताछ के समय अन्य किसी वर्ग से अगर ४ सवाल किये जाते हैं तो एक मुस्लिम से ६, वहीं यदि अन्य वर्ग २ सवालों के जवाब गलत देगा तो उसे थोडी ढिलाई से छोड़ दिया जाता है लेकिन हम लोग ६ में से यदि एक सवाल का जवाब भी गलत दे दें सो समझ जाइये शाम को थाने में हाजरी पक्की है.कब तक लोग हमारी देश भक्ति पर शक करते रहेंगे? हम भी ये सोचकर चुप हो जाए हैं की हमीं में से कुछ लोगों ने हमें बदनाम कर रखा है.
आशीष:
कभी कभी सोचता हूं कि यदि मैं मुस्लिम होता है तो इस देश में कैसे जीता?
घुघूती बासूती:

नदीम जी, आपकी बात को कुछ कछ समझ सकती हूँ । आशीष जी की तरह बहुत बार अपने आप को आपकी जगह रख कर सोचा है । स्थिति ऐसी हो गई है कि प्रकाश की किरण को हम सबको मिलकर ढूँढना होगा । हमें अपनी व आपकी व हम सबके धर्मों के लोगों की मानसिकता को भी समझना होगा । अन्य देशों के मुसलमानों के बारे में तो नहीं कह सकती, परन्तु अपने देश के लोगों के लिए जो समझ आता है वह कुछ वैसा लगता है जैसा मुझे पहाड़, उत्तराखंड को लेकर लगता है । यदि मैं उत्तराखंड में रह रही होती या मेरे आसपास के सब लोग उत्तराखंडी होते या मैं यहाँ एक अकेली उत्तराखंडी ना होती या मेरे घर में मेरी मातृभाषा कुमाऊँनी बोली जाती तो शायद मुझे वहाँ की इतनी याद, इतनी नॉराई नहीं लगती । बहुसंख्यक को ना अपनी भाषा , न अपनी संस्कृति को बचाए रखने का उतना उत्साह होता है, ना उसके खोने का उतना भय होता है जितना अल्पसंख्यक को । जहाँ तक पुलिस का प्रश्न है तो जैसा वेतन हम उन्हें देते हैं उसके अनुकूल ही उनका व्यवहार व निष्ठा हम पाते हैं । यदि हम सोचें कि मूँगफली देकर महामानव पुलिस वाले पाएँगें तो हम मूर्ख हैं।
नदीम:
घुघूती जी आपके विचारों के लिए तथा सहानभूति के लिए धन्यवाद. अब अगर ये समाज बदलेगा तो केवल पढ़ लिखे तथा खुले विचारों के लोग ही सुधरेंगे. मुझे उम्मीद है आप लोगों जैसे साथियों का साथ बना रहेगा.

Saturday, February 16, 2008

मुसलमान होने की सज़ा

नाम में क्या रखा है, ये कहने के बाद शेक्सपीयर सदियों पहले मर गया. लेकिन नाम से निकलने वाली प्रतिध्वनियां आधुनिक मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ रही हैं. जटिलता भरे समाज में नाम का मसला इंसान की एक ख़ास तरह की पहचान से जुड़ जाता है. इसके आधार पर जहां बहुसंख्यक-ताक़तवर लोग फायदे में रहते हैं तो अल्पसंख्यक-कमजोर लोगों को कई तरह की मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.
हमारे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र की पोल खोलने के लिए एक घटना काफी है. पिछले साल गोरखपुर में बम धमाकों के लिए एक शख्स को सिर्फ इसलिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया गया कि उसके नाम में एक मुसलमान की पहचान छिपी थी.
आफ़ताब आलम अंसारी पश्चिम बंगाल इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड का कर्मचारी है. बारह दिसम्बर को उसे पश्चिम बंगाल सीआईडी ने कोलकाता से पकड़कर यूपी एसटीफ़ को सौंप दिया. फिर शुरू हुआ शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना का दौर. पुलिस ने उसे गोरखपुर बम धमाकों का मुख्य आरोपी बनाया और बांग्लादेशी आतंकवादी संगठन हूजी का एक बहुत ही ख़तरनाक आतंवादी बना डाला. हर वक़्त सनसनी खोजने की फिराक में रहने वाले मीडिया ने भी पुलिस की कहानी को हक़ीक़त की तरह देश के सामने पेश किया. सीधे-सादे आफ़ताब को पूरे देश में आतंकवादी मान लिया गया. बाद में जब आफताब की मां और एक मानवाधिकार संस्था ने आफ़ताब का पक्ष सामने रखा तो पुलिस का सारा फर्जीबाड़ा सामने आ गया. अदालत को मजबूर होकर आफ़ताब को रिहा करना पड़ा.
कल आफ़ताब दिल्ली में था. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ (जेएनयूएसयू) और फोरम फॉर डेमोक्रेटिक इनिशिएटिव (एफडीआई) के साथियों ने आफ़ताब को मीडिया के सामने पेश किया तो वो आपबीती सुनाते हुए फफक-फफककर रो पड़ा. आफ़ताब ने बताया कि किस तरह पुलिस उसे मुख्तार बनाने और उसके बैंक अकाउंट में छै करोड़ रुपए होने की बात क़ुबूल करवाने पर तुली थी.
आफताब की जान तो बच गई लेकिन उसे बेवजह दी गई तकलीफ़ पर क्या ये सरकार मांफी मांगेगी? क्या आफ़ताब को मिली प्रताड़ना का मुआवजा उसे दिया जा सकता है?

Friday, February 15, 2008

फैज़ अहमद फैज़ को याद करते हुए

हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लौह-ए-अजल में लिखा है
जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां
रुई की तरह उड़ जाएँगे
दम महकूमों के पाँव तले
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
हम अहल-ए-सफा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाए जाएंगे
सब ताज उछाले जाएंगे
सब तख्त गिराए जाएंगे
और राज करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो


कई साल पहले मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में शुभा मुद्गल की आवाज़ में इसे सुनकर हम दोस्त लोग झूम रहे थे. कुछ तो स्लो मोशन में डांस भी कर रहे थे. हम ढेर सारे लड़के-लड़कियां नए दुनिया के सपनों को साथ लिए वहां जुटे थे. जब भी फैज़ का नाम आता है. मुंबई का वो नज़ारा आंखों के सामने ताज़ा हो जाता है. कल स्टेन ऑडिटोरियम में फैज़ की नज़्मों को फिर से सुनने का मौक़ा मिला. रिमेम्बरिंग फैज़ प्रोग्राम के तहत राधिका चोपड़ा फैज़ की नज्में सुना रही थीं. फैज़ के नाम पर मैं यूं ही ऑडिटोरियम के भीतर पहुंच गया. ये भी नहीं पता था कि स्टेज पर कौन गा रहा है. बहुत देर तक मैं इस भ्रम में रहा कि शायद पाकिस्तानी गायिका ताहिरा सैय्यद गा रही हैं. ऐसा सोचने की वजह सिर्फ इतनी सी थी ताहिरा की तरह ही राधिका भी काफी ख़ूबसूरत है. कुछ महीने पहले ही मैंने ताहिरा को मंच पर गाते हुए सुना था. मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि फैज़ की इतनी नज़्मों को इतनी ख़ूबसूरती से इतनी अदाओं में गाया भी जा सकता है. सामने से राधिका सुना रही थी-

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब ना मांग

मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शा है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहरका झ़गडा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं हो जाए
यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशमों- अतलसो- कमख्वाब में बुनवाये हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
खाक में लिथडे हुए, ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग


छात्र राजनीति के दौरान जब भी प्रेम और क्रांति के बारे में हम लोग बात करते थे तो इस नज़्म का ज़िक्र बार-बार आता था. ये बात और है कि आज ना तो क्रांति को लेकर उस तरह का उत्साह बचा है और ना ही वो प्रेम. मुझे पुराने दिन याद आ रहे थे और राधिका सुना रही थीं-

शाम ए फिराक अब ना पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया, जां थी कि फिर संभल गई

जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक महक उठी
जब तेरा गम जगा लिया, रात मचल मचल गई

दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ हम
कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई


राधिका जितनी सुरीली आवाज़ में गा रही थीं वो अपने शागिर्दों को भी उतना ही मौक़ा दे रही थी. शागिर्द जब तबले पर अपना हुनर दिखा रहा था तो वो मंच से ही उसे बार-बार दाद भी दे रही थीं. राधिका ने फिर सुनाया -

दोनों जहान मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई सब-ए-ग़म गुज़ार के.


आज पढ़ना-लिखना लगातार छूटता जा रहा है. पढ़ते भी हैं तो नई-नई चींज़ें सामने होती हैं. पुराने पढ़े हुए को फिर से पढ़ने का मौक़ा कम ही मिलता है. ऐसे में फैज़ को सुनना ख़ुद को ही रिविजिट करने की तरह लगा.